"Supreme Court Judge Appointment Process: क्या है कॉलेजियम सिस्टम और कैसे होती है सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति"

 

Supreme Court Judge Appointment Process

भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) भारतीय लोकतंत्र का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह संविधान का रक्षक और देश का अंतिम अपीलीय न्यायालय है। इसकी कार्यप्रणाली, न्यायाधीशों की नियुक्ति और न्याय करने के आधारों को समझना भारतीय नागरिक के लिए अत्यंत आवश्यक है।

1. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया

भारत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 'कॉलेजियम सिस्टम' (Collegium System) का पालन किया जाता है। यह दुनिया की अनूठी प्रणालियों में से एक है क्योंकि यहाँ न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नाम तय करते हैं।

संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 124)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। इसमें "परामर्श" (Consultation) शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसकी व्याख्या समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं की है।

कॉलेजियम प्रणाली का विकास

यह प्रणाली किसी कानून या संविधान के मूल पाठ से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन ऐतिहासिक फैसलों (Three Judges Cases) से निकली है:

प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): कोर्ट ने कहा कि "परामर्श" का मतलब "सहमति" नहीं है। सरकार जज के नाम को अस्वीकार कर सकती थी।

द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993): कोर्ट ने अपना पिछला फैसला पलट दिया और कहा कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) की सलाह अनिवार्य है। यहीं से कॉलेजियम का जन्म हुआ।

तृतीय न्यायाधीश मामला (1998): राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई राय के बाद कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम में CJI और 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होंगे।

नियुक्ति के चरण

नामों का चयन: कॉलेजियम जजों के नामों पर विचार करता है और केंद्र सरकार को सिफारिश भेजता है।

आईबी (IB) जांच: केंद्र सरकार इन नामों पर खुफिया ब्यूरो से जांच करवाती है।

पुनर्विचार: सरकार चाहे तो नाम वापस भेज सकती है, लेकिन यदि कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेज दे, तो सरकार उसे मानने के लिए बाध्य होती है।

राष्ट्रपति की मुहर: अंततः राष्ट्रपति की वारंट द्वारा नियुक्ति की जाती है।

2. न्याय करने का आधार: फैसला कैसे सुनाया जाता है?

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश केवल अपनी इच्छा से फैसला नहीं देते। उनके निर्णय संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और पूर्व उदाहरणों पर आधारित होते हैं।

(i) संविधान की व्याख्या (Interpretation of Constitution)

सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा कार्य संविधान की व्याख्या करना है। यदि किसी कानून या सरकारी आदेश से संविधान के "मूल ढांचे" (Basic Structure) का उल्लंघन होता है, तो कोर्ट उसे रद्द कर सकता है।

(ii) विधि का शासन और अधिनियम (Statutes and Acts)

कोर्ट संसद द्वारा बनाए गए कानूनों (जैसे IPC, CRPC, अब भारतीय न्याय संहिता) के आधार पर मुकदमों का फैसला करता है। न्यायाधीश यह देखते हैं कि क्या कानून का पालन सही तरीके से हुआ है।

(iii) पूर्व निर्णय का सिद्धांत (Doctrine of Stare Decisis)

संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है।

Ratio Decidendi: फैसले का वह मुख्य कानूनी तर्क जो भविष्य के मामलों के लिए कानून बन जाता है।

Obiter Dicta: न्यायाधीश द्वारा फैसले के दौरान कही गई अतिरिक्त बातें, जो बाध्यकारी नहीं होतीं लेकिन महत्वपूर्ण होती हैं।

3. सुप्रीम कोर्ट की न्याय प्रणाली और कार्यक्षेत्र

सुप्रीम कोर्ट का कार्यक्षेत्र (Jurisdiction) अत्यंत विस्तृत है। इसे मुख्य रूप से चार भागों में बांटा जा सकता है:

क. प्रारंभिक क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction)

अनुच्छेद 131 के तहत कुछ मामले सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाते हैं:

भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद।

दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद।

अनुच्छेद 32: मौलिक अधिकारों के हनन पर कोई भी नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है (रिट क्षेत्राधिकार)।

ख. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction)

यह देश की सबसे बड़ी अपील अदालत है। यहाँ निचली अदालतों (High Courts) के फैसलों के खिलाफ अपील की जा सकती है:

संवैधानिक मामले: जहाँ संविधान की व्याख्या का प्रश्न हो।

दीवानी (Civil) मामले: जहाँ कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हो।

फौजदारी (Criminal) मामले: जहाँ हाई कोर्ट ने किसी की सजा को मौत की सजा में बदल दिया हो।

ग. परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction)

अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति किसी कानूनी या तथ्यपरक प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकते हैं। हालांकि, कोर्ट सलाह देने के लिए बाध्य नहीं है, और न ही राष्ट्रपति उसे मानने के लिए बाध्य हैं।

घ. अभिलेख न्यायालय (Court of Record)

अनुच्छेद 129 के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के सभी फैसले रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं और भविष्य में संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। कोर्ट को अपनी 'अवमानना' (Contempt of Court) के लिए दंड देने की भी शक्ति है।

4. न्याय की प्रक्रिया: बेंच (पीठ) का गठन

सुप्रीम कोर्ट में मामले 'बेंच' द्वारा सुने जाते हैं।

डिवीजन बेंच: इसमें सामान्यतः 2 या 3 जज होते हैं।

संवैधानिक बेंच: जब संविधान की व्याख्या का गंभीर प्रश्न हो, तो कम से कम 5 जजों की पीठ बैठती है। ऐतिहासिक मामलों में यह संख्या 7, 9, 11 या 13 (केशवानंद भारती केस) तक हो सकती है।

नोट -

भारतीय सुप्रीम कोर्ट न केवल एक अदालत है, बल्कि लोकतंत्र का संरक्षक भी है। कॉलेजियम प्रणाली के जरिए इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाती है, ताकि न्यायपालिका कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रहकर संविधान और कानून के आधार पर निष्पक्ष फैसले ले सके।

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विकल्प 2: विवाद और शक्ति पर केंद्रित

"कॉलेजियम बनाम सरकार: न्यायाधीशों की नियुक्ति का वो गुप्त सच, जो बदल देता है भारत की न्याय प्रणाली!"

  - सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर वर्तमान सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से एक वैचारिक द्वंद्व चल रहा है। सरकार ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के माध्यम से एक बड़ा बदलाव करने का प्रयास किया था, लेकिन वर्तमान में स्थिति कुछ अलग है।

यहाँ मुख्य बदलावों और वर्तमान स्थिति का विवरण दिया गया है:

1. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) - सबसे बड़ा प्रयास

सरकार ने 2014 में 99वां संविधान संशोधन पारित किया था, जिसका उद्देश्य दशकों पुरानी 'कॉलेजियम प्रणाली' को समाप्त करना था।

बदलाव क्या था? इस नए नियम के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक आयोग बनना था जिसमें मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठ न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और दो 'प्रतिष्ठित व्यक्ति' शामिल होने थे।

परिणाम: 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' (जो कि संविधान का मूल ढांचा है) के खिलाफ है।

2. मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) पर जोर

NJAC के रद्द होने के बाद, सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) को लेकर चर्चा चल रही है। सरकार चाहती है कि:

नियुक्ति प्रक्रिया में 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के आधार पर नाम खारिज करने का अधिकार सरकार के पास हो।

नियुक्ति के लिए एक 'सर्च एंड इवैल्यूएशन कमेटी' (Search and Evaluation Committee) बनाई जाए, जो नामों की जांच करे।

वर्तमान स्थिति: सरकार समय-समय पर कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नामों पर आपत्ति जताती है या उन्हें पुनर्विचार के लिए वापस भेज देती है, जिसे कई बार 'प्रच्छन्न हस्तक्षेप' (indirect interference) के रूप में देखा जाता है।

3. सामाजिक विविधता का आग्रह

हाल के वर्षों में (2024-2026 के बीच), सरकार ने संसद और विभिन्न समितियों के माध्यम से यह मांग उठाई है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में SC, ST, OBC और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सरकार का तर्क है कि वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में सामाजिक विविधता की कमी है।

4. डाटा और पारदर्शिता की मांग

सरकार अब इस बात पर भी जोर दे रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक निश्चित पैमाना (Parameter) होना चाहिए। हाल ही में कॉलेजियम ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप उम्मीदवारों के इंटरव्यू लेने और उनके निर्णयों (Judgments) का अधिक बारीकी से मूल्यांकन करना शुरू किया है, जो कहीं न कहीं सरकारी और सार्वजनिक दबाव का ही परिणाम है।


वर्तमान में, सरकार सीधे तौर पर नियुक्ति के नियमों को बदलने में सफल नहीं हुई है, लेकिन वह 'मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर' और नामों की जांच के माध्यम से इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका को मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
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सिमी ग्रेवाल भारतीय सिनेमा और टेलीविजन की उन चुनिंदा शख्सियतों में से हैं, जिन्होंने ग्लैमर, शालीनता और बौद्धिकता का एक अनूठा संगम पेश किया। उन्हें 'लेडी इन व्हाइट' के नाम से जाना जाता है।
यहाँ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं, संघर्षों और उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन है:👇

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