किरदार, कला और अकेलापन: संजीव कुमार के अनछुए अनसुने पहलू

संजीव कुमार

संजीव कुमार (1938–1985) भारतीय सिनेमा के उन विरले अभिनेताओं में से थे, जिन्होंने कभी अपनी 'स्टार इमेज' की चिंता नहीं की। जहाँ उनके समकालीन कलाकार अपनी जवानी और 'चॉकलेट बॉय' इमेज बचाने में लगे थे, वहीं संजीव कुमार ने 20-22 साल की उम्र में ही वृद्धों की भूमिका निभाना शुरू कर दिया था।

​यहाँ उनके जीवन का एक विस्तृत चित्रण दिया गया है:

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

​संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में एक गुजराती परिवार में हुआ था। उनका असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था। उनके परिवार का पेशा जरी का काम था, लेकिन हरिहर की दिलचस्पी बचपन से ही अभिनय में थी।

​जब वे छोटे थे, तभी उनका परिवार मुंबई आ गया। मुंबई के मध्यमवर्गीय माहौल में पले-बढ़े हरिहर ने थिएटर (इप्टा और इंडियन नेशनल थिएटर) से अपने अभिनय की शुरुआत की। यहीं से उनके भीतर का वह कलाकार निखरा, जो बाद में 'अभिनय की पाठशाला' कहलाया।

फिल्मों में प्रवेश और नाम का बदलाव

​1960 में फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' में एक छोटी सी भूमिका के साथ उन्होंने फिल्मी पर्दे पर कदम रखा। उस दौर में अभिनेताओं के नाम बदलने का चलन था, इसलिए हरिहर जरीवाला बन गए संजीव कुमार

​शुरुआती दौर उनके लिए आसान नहीं था। उन्हें कई सी-ग्रेड फिल्मों और स्टंट फिल्मों (जैसे 'निशान') में काम करना पड़ा। लेकिन उनकी प्रतिभा को पहचान तब मिली जब 1968 में फिल्म 'संघर्ष' आई। इस फिल्म में उनके सामने दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार थे। एक दृश्य में जब उन्होंने दिलीप कुमार के सामने बेखौफ होकर संवाद बोले, तो पूरी इंडस्ट्री को समझ आ गया कि एक नया सितारा आ चुका है।

अभिनय की विविधता: एक 'वर्सेटाइल' कलाकार

​संजीव कुमार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे किसी भी सांचे में ढल सकते थे।

1. गुलज़ार के साथ जुगलबंदी

​निर्देशक गुलज़ार के साथ संजीव कुमार का रिश्ता बेहद खास था। गुलज़ार ने उनके भीतर के गंभीर और परिपक्व कलाकार को पहचाना।

  • कोशिश (1972): इसमें उन्होंने एक गूंगे और बहरे व्यक्ति की भूमिका निभाई। इसके लिए उन्हें अपना दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
  • आंधी (1975): एक राजनेता के पति के रूप में उनकी भूमिका आज भी मील का पत्थर मानी जाती है।
  • मौसम (1975): इस फिल्म में उन्होंने जवानी से बुढ़ापे तक के सफर को इतनी सहजता से निभाया कि दर्शक दंग रह गए।

2. कॉमेडी में बेमिसाल

​जहाँ वे गंभीर भूमिकाओं में जान डाल देते थे, वहीं कॉमेडी में भी उनका कोई सानी नहीं था।

  • अंगूर (1982): शेक्सपियर के 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' पर आधारित इस फिल्म में संजीव कुमार की दोहरी भूमिका और उनकी कॉमिक टाइमिंग को आज भी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • पति पत्नी और वो: इसमें उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जो अपनी पत्नी और बाहर की दुनिया के बीच फंसा रहता है।

3. यादगार भूमिकाएं

  • शोले (1975): 'ठाकुर बलदेव सिंह' का किरदार संजीव कुमार के बिना अधूरा होता। बिना हाथों के, सिर्फ आंखों और आवाज के जरिए उन्होंने जो खौफ और लाचारी दिखाई, वह अद्भुत थी।
  • शतरंज के खिलाड़ी: सत्यजीत रे जैसे महान निर्देशक ने अपनी पहली हिंदी फिल्म के लिए संजीव कुमार को चुना, जो उनकी महानता का प्रमाण है।

पुरस्कार और सम्मान

​संजीव कुमार को उनके करियर में ढेरों सम्मान मिले, जिनमें मुख्य हैं:

  1. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता): फिल्म 'दस्तक' (1970) और 'कोशिश' (1972) के लिए।
  2. फिल्मफेयर पुरस्कार: 'आंधी' और 'अर्जुन पंडित' जैसी फिल्मों के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।

निजी जीवन और अकेलापन

​परदे पर सफल संजीव कुमार का निजी जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने कभी शादी नहीं की। हेमा मालिनी के साथ उनके प्रेम संबंध और फिर उनके प्रस्ताव के ठुकराए जाने की चर्चा लंबे समय तक रही। कहा जाता है कि वे दिल टूटने के बाद और भी अकेले हो गए थे।

​वे खाने के बेहद शौकीन थे, लेकिन उनके परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास था। उनके भाई और पिता का निधन भी कम उम्र में हृदय गति रुकने से हुआ था। संजीव कुमार को भी हमेशा यह आभास रहता था कि वे लंबी उम्र नहीं जिएंगे।

अंतिम समय

​नियति का क्रूर मजाक देखिए कि जिस अभिनेता ने पर्दे पर दर्जनों बार 'बूढ़े' का किरदार निभाया, वह असल जिंदगी में कभी बूढ़ा नहीं हो पाया। 6 नवंबर 1985 को मात्र 47 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

निष्कर्ष

​संजीव कुमार आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनके निभाए किरदार अभिनय सीखने वाले छात्रों के लिए एक टेक्स्टबुक की तरह हैं। वे एक ऐसे 'आम आदमी' के अभिनेता थे, जिनकी जगह हिंदी सिनेमा में शायद ही कोई और भर पाए।


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