​"BRICS 2026: क्या ईरान-इजरायल की जंग भारत के 'ग्लोबल लीडर' बनने के सपने को तोड़ देगी?"

 


ईरान-इजरायल के बीच छिड़े युद्ध ने वैश्विक कूटनीति की बिसात बदल दी है, और भारत के लिए, जो वर्तमान में BRICS (2026) का अध्यक्ष है, यह स्थिति एक "राजनयिक अग्निपरीक्षा" के समान है।

BRICS अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रहा, बल्कि इसमें ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और मिस्र जैसे देश शामिल हो चुके हैं। इस विस्तार ने भारत के सामने ऐसी जटिल चुनौतियाँ पेश की हैं, जहाँ "साझा सहमति" (Consensus) बनाना लगभग असंभव होता जा रहा है।

यहाँ उन प्रमुख समस्याओं का विस्तृत विवरण दिया गया है जिनका सामना भारत को BRICS के भीतर करना पड़ रहा है:

1. वैचारिक ध्रुवीकरण और गुटबाजी (Ideological Polarization)

BRICS के भीतर अब स्पष्ट रूप से दो वैचारिक गुट बन गए हैं, जिससे भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" (Strategic Autonomy) खतरे में है:

चीन-रूस-ईरान धुरी: ये देश इस युद्ध को पश्चिमी साम्राज्यवाद और इजरायल की आक्रामकता के रूप में देख रहे हैं। रूस और चीन ने खुले तौर पर अमेरिका और इजरायल के हमलों की निंदा की है।

भारत का मध्यम मार्ग: भारत ने न तो इजरायल की पूरी तरह निंदा की है और न ही ईरान के हमलों का समर्थन किया है। भारत का यह रुख चीन और रूस को अखर रहा है, जो चाहते हैं कि BRICS एक "पश्चिम-विरोधी" (Anti-West) ब्लॉक के रूप में उभरे।

2. सदस्य देशों के बीच सीधा संघर्ष (Direct Conflict between Members)

इतिहास में पहली बार, BRICS के दो सदस्य देश (ईरान और UAE/सऊदी अरब) परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं।

फरवरी 2026 में ईरान द्वारा UAE के बुनियादी ढांचे पर किए गए मिसाइल हमलों ने BRICS की एकजुटता को तार-तार कर दिया है।

भारत की दुविधा: अध्यक्ष के रूप में भारत को एक "साझा बयान" जारी करना है, लेकिन जहाँ ईरान चाहता है कि इजरायल को 'आक्रामक' घोषित किया जाए, वहीं UAE और सऊदी अरब अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।

3. आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा का संकट (Energy and Economic Security)

भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों के तेल और गैस पर निर्भर है।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): ईरान द्वारा इस मार्ग को बाधित करने की धमकी से भारत की 80% तेल आपूर्ति खतरे में है।

IMEC बनाम INSTC: भारत जिस 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे' (IMEC) को बढ़ावा दे रहा था, वह युद्ध के कारण ठप हो गया है। अब भारत को मजबूरी में 'उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे' (INSTC) पर निर्भर होना पड़ रहा है, जो ईरान के माध्यम से रूस तक जाता है। इससे भारत पर रूस और ईरान का प्रभाव बढ़ सकता है, जो अमेरिका के साथ भारत के संबंधों को तनावपूर्ण बना सकता है।

4. 'ग्लोबल साउथ' के नेतृत्व पर सवाल

भारत खुद को 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की आवाज के रूप में पेश करता है।

अधिकांश विकासशील देश इस युद्ध में फिलिस्तीन और ईरान के प्रति सहानुभूति रखते हैं।

यदि भारत इजरायल के प्रति नरम रुख अपनाता है, तो BRICS के अन्य सदस्य (जैसे ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका) भारत के नेतृत्व पर सवाल उठा सकते हैं। दक्षिण अफ्रीका ने पहले ही इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में कड़ा रुख अपनाया है, जिससे भारत के लिए साझा सहमति बनाना और भी कठिन हो गया है।

5. पश्चिमी देशों के साथ संतुलन (Balancing with the West)

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका-इजरायल और BRICS के बीच संतुलन बनाना है।

रूस और चीन BRICS का उपयोग डॉलर के प्रभुत्व को खत्म करने (De-dollarization) और पश्चिम को चुनौती देने के लिए करना चाहते हैं।

भारत नहीं चाहता कि BRICS पूरी तरह से अमेरिका विरोधी मंच बने, क्योंकि भारत के रक्षा और तकनीकी हित अमेरिका से जुड़े हैं। ईरान-इजरायल युद्ध ने इस दरार को और गहरा कर दिया है।

निष्कर्ष और भारत का भविष्य का रुख

भारत वर्तमान में "शेरपा स्तर" की वार्ताओं के माध्यम से बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। भारत का मुख्य जोर 'मानवीय दृष्टिकोण' और 'संवाद' पर है, न कि किसी एक पक्ष की निंदा पर। हालांकि, 2026 के शिखर सम्मेलन तक यदि युद्ध नहीं थमता, तो BRICS के भीतर एक "साझा घोषणापत्र" (Joint Declaration) तैयार करना भारत की कूटनीति के लिए सबसे कठिन कार्य होगा।

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