खाड़ी देशों का विश्वास ट्रंप पर कम होता जा रहा है ?
ट्रंप के प्रति खाड़ी देशों (Gulf Countries) के भरोसे का विश्लेषण एक अत्यंत जटिल और बहुआयामी विषय है। यह भरोसा समय के साथ स्थिर रहने के बजाय 'व्यावहारिकता' (Pragmatism) और 'अनिश्चितता' (Uncertainty) के बीच झूलता रहा है।
यहाँ इस विषय पर विस्तृत विवरण दिया गया है:
ट्रंप और खाड़ी देश: भरोसे की बुनियाद और वर्तमान स्थिति
डोनाल्ड ट्रंप का खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ संबंध हमेशा से "पर्सनल केमिस्ट्री" और "लेन-देन" (Transactional) की राजनीति पर आधारित रहा है। वर्तमान परिदृश्य (2025-26) में यह भरोसा कई महत्वपूर्ण मोड़ों से गुजर रहा है।
1. व्यक्तिगत संबंधों की मजबूती (The Personal Factor)
खाड़ी देशों के शासकों (जैसे सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के मोहम्मद बिन जायद) के लिए ट्रंप एक ऐसे नेता रहे हैं जिनसे वे सीधे संवाद कर सकते हैं।
हैंडशेक डिप्लोमेसी: ट्रंप संस्थागत प्रक्रियाओं के बजाय व्यक्तिगत वादों पर अधिक भरोसा करते हैं। खाड़ी देशों को यह शैली पसंद आती है क्योंकि वहां भी सत्ता का केंद्र व्यक्तिगत नेतृत्व ही है।
व्यावसायिक हित: ट्रंप परिवार के खाड़ी देशों में रियल एस्टेट और गोल्फ कोर्स जैसे बड़े निवेश हैं। ओमान और सऊदी अरब में उनके प्रोजेक्ट्स ने एक ऐसा आर्थिक ताना-बाना बुना है, जिससे इन देशों को लगता है कि ट्रंप के निजी हित उनके राष्ट्रीय हितों से जुड़े हुए हैं।
2. सुरक्षा गारंटी और ईरान का मुद्दा
खाड़ी देशों के भरोसे का सबसे बड़ा आधार 'ईरान' है।
मैक्सिमम प्रेशर: ट्रंप की ईरान के प्रति सख्त नीति (परमाणु समझौते से बाहर निकलना और कड़े प्रतिबंध) ने शुरुआत में खाड़ी देशों का दिल जीता था।
भरोसे में कमी का कारण: हालांकि, 2019 में जब सऊदी अरब के अरामको तेल केंद्रों पर हमला हुआ और ट्रंप ने कोई सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं की, तब खाड़ी देशों के मन में यह सवाल उठा कि क्या अमेरिका वास्तव में उनकी रक्षा के लिए युद्ध में कूदेगा?
वर्तमान स्थिति (2026): हालिया 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' और ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमलों ने फिर से यह संकेत दिया है कि ट्रंप प्रशासन सैन्य शक्ति का उपयोग करने से पीछे नहीं हटेगा, जिससे सुरक्षा को लेकर भरोसा बहाल हुआ है।
3. अब्राहम एकॉर्ड्स (Abraham Accords) और क्षेत्रीय स्थिरता
ट्रंप के पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि 'अब्राहम एकॉर्ड्स' थी, जिसने इजरायल और कई अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाया।
आर्थिक लाभ: इन समझौतों से रक्षा, तकनीक और पर्यटन में अरबों डॉलर का निवेश हुआ है।
संदेह के बादल: गाजा युद्ध (2024-25) और फिलिस्तीन मुद्दे पर ट्रंप की 'एकतरफा' इजरायल समर्थक छवि ने खाड़ी देशों को असहज किया है। वे नहीं चाहते कि इजरायल के साथ दोस्ती उनकी अपनी जनता के बीच उनकी छवि खराब करे।
भरोसे के सामने वर्तमान चुनौतियां (2025-26 के संदर्भ में)
निष्कर्ष: भरोसा या मजबूरी?
खाड़ी देशों का ट्रंप पर भरोसा "पूरी तरह अटूट" नहीं है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर है कि ट्रंप उनके लिए क्या टेबल पर लाते हैं। वे ट्रंप को बाइडेन या हैरिस की तुलना में बेहतर समझते हैं क्योंकि ट्रंप मानवाधिकारों के मुद्दे पर उन्हें परेशान नहीं करते। लेकिन, ट्रंप की 'अनिश्चितता' (Unpredictability) उन्हें हमेशा सतर्क रखती है।
आज के समय में खाड़ी देश 'हेजिंग' (Hedging) कर रहे हैं—वे ट्रंप के साथ करीबी तो चाहते हैं, लेकिन साथ ही चीन और रूस के साथ भी अपने विकल्प खुले रख रहे हैं ताकि वे केवल वाशिंगटन के भरोसे न रहें।


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