ईदगाह - मुंशी प्रेमचंद

 


मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी 'ईदगाह' केवल एक बच्चे की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रेम, त्याग और मनोविज्ञान का एक अद्भुत संगम है।

यहाँ इस कहानी का सार प्रस्तुत है:

ईदगाह: कहानी का सारांश

1. ईद की सुबह और हामिद की खुशी

रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद आज ईद आई है। गाँव में हर तरफ हलचल है। बच्चे सबसे ज्यादा खुश हैं, क्योंकि उन्हें ईदगाह जाने और वहाँ 'ईदगाह के मेले' में घूमने का मौका मिलेगा। इन्हीं बच्चों में चार-पाँच साल का हामिद भी है।

हामिद के माता-पिता नहीं हैं। वह अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उसे बताया गया है कि उसके अब्बा जान रुपये कमाने गए हैं और अम्मी जान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बहुत सी अच्छी चीजें लाने गई हैं। इसी उम्मीद में हामिद बेहद खुश और आशावादी है।

2. अमीना की चिंता और हामिद की रवानगी

दादी अमीना के पास हामिद को देने के लिए सिर्फ तीन पैसे हैं। वह उदास है कि ईद के दिन उसके घर में दाना तक नहीं है और हामिद अकेले मेले कैसे जाएगा। लेकिन हामिद अपनी दादी को दिलासा देता है और गाँव के बच्चों के साथ मेले की ओर निकल पड़ता है।

3. मेले का दृश्य और खिलौनों का आकर्षण

मेले में हामिद के दोस्त—महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी—खूब मस्ती करते हैं।

महमूद सिपाही खरीदता है।

मोहसिन भिश्ती लेता है।

नूरे वकील खरीदता है।

सब बच्चे मिठाइयाँ और रेवड़ियाँ खाते हैं।

हामिद के पास केवल तीन पैसे हैं। वह सोचता है कि मिट्टी के इन खिलौनों पर पैसे क्यों बर्बाद करना, जो गिरते ही टूट जाएँगे। वह अपने दोस्तों के मजे को बड़े संयम से देखता रहता है।

4. हामिद का अनोखा उपहार: चिमटा

मेले के अंत में हामिद की नजर लोहे की एक दुकान पर पड़ती है। वहाँ उसे चिमटा दिखाई देता है। उसे याद आता है कि जब दादी रोटियाँ उतारती हैं, तो उनके हाथ जल जाते हैं। हामिद अपनी भूख और खिलौनों की चाहत को मार देता है और अपने उन कीमती तीन पैसों से दादी के लिए चिमटा खरीद लेता है।

जब वह लौटता है, तो उसके दोस्त उसका मजाक उड़ाते हैं। लेकिन हामिद अपनी तर्कशक्ति से सबको लाजवाब कर देता है। वह कहता है कि मेरा चिमटा 'रुस्तम-ए-हिंद' है, जो तुम्हारे मिट्टी के खिलौनों को चकनाचूर कर सकता है। धीरे-धीरे सब बच्चे उसके चिमटे के मुरीद हो जाते हैं।

5. दादी का प्यार और हामिद का बड़प्पन

घर पहुँचने पर जब हामिद दादी को चिमटा दिखाता है, तो अमीना पहले तो नाराज होती है कि दोपहर तक इस बच्चे ने कुछ खाया-पिया नहीं और यह लोहे का चिमटा उठा लाया।

लेकिन जब हामिद बड़ी मासूमियत से कहता है— "तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे लिया," तो दादी का सारा गुस्सा आँसुओं में बदल जाता है।

कहानी का सबसे भावुक क्षण: बुढ़िया अमीना एक छोटी बच्ची की तरह रोने लगती है और बच्चे हामिद ने एक समझदार बुजुर्ग की तरह व्यवहार किया। वह दादी को दुआएँ देती जाती है और आँसू बहाती जाती है।

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